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Prem patra

मेरे अल्फाज़

प्रेम पत्र

Pradeep Shukla

3 कविताएं

388 Views
तुम्हें प्यार करने की वजह
नहीं जानता हूँ मैं
न ही इजहार करने का
सलीका ही पता है! मुझे
इस पुराने खेल के
नये नये नियम और पैतरों से
शायद बेखबर हूँ मैं
मैं जानता हूँ जो
वो सिर्फ इतना है कि
मैं तुमसे प्यार करता हूँ
एक दिन में सौ साल
एक पल में सौ बार करता हूँ।
अपनी मुस्कुराहट से तुम्हें
हर बार करता हूँ आगाह
और अपनी सांसो से ही
इजहार करता हूँ।।
मगर ये जो भी बेचैनी है
मेरी सांसो में
ये जो भी नशा होता है
मुझे हर सुबह का
ये जो भी फितूर है मेरी आंखों में
ये गवाही दे रहे हैं इस बात की
कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ

हंसी आ सकती है
तुम्हें मेरी बात को सुनकर
मगर मैं रोकर भी
तुम्हें दिखा नहीं सकता हूं। क्योंकि
लगी है आंसुओं से शर्त मेरी
और दर्द इंतजार में है कि
आंसू दे मुझे हरा
और वो मुझे गिरफ्त में कर ले
मगर कुछ कसम सी दिल ने
खा रखी है जैसे
कि भले ही दर्द बहे रगों में
खून के बदले
पर आंखों में उसके निशा नहीं होंगे।।

मुमकिन है कि अल्फाज़ मेरे
जरा कुछ फिल्मी हों
मगर सच ये है
कि इश्क
फिल्मों के सिवा नहीं देखा मैंने
ये लब्ज भी। अब से पहले
था कभी नहीं सीखा मैंने
मगर ये सब दास्तान सच है
उसी तरह
जिस तरह धरती आसमान
मैं और तुम
और तुम्हारे सीने में मेरे नाम का
धड़कता दिल
अब ये फैसला तुम पर है
कि तुम इसे इश्क समझो
या मेरा पागलपन
मुझे सब ही मंजूर है।
क्योंकि
इश्क अगला मकाम
पागलपन ही होता है।।
- प्रदीप

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