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मेरे अल्फाज़

दर्द

pradeep dahiya

45 कविताएं

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आसुओं को बहाकर क्या मिलेगा
तुझको चाहकर क्या मिलेगा।
समुंदर सी खासियत है तेरी,
तेरे पास आकर क्या मिलेगा।
लौट जाता हूं बेआस सा तेरे दर से,
बार बार जख़्म दिखाकर क्या मिलेगा।
तू अपना है तुझसे गिला क्या,
तू ही सोच मुझको रुलाकर क्या मिलेगा।
दुआए काम आती हैं बददुआ ना ले किसी की,
सोच जरा अपनी ही मां को सताकर क्या मिलेगा!!!

प्रदीप दहिया

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