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मेरे अल्फाज़

पुलवामा के दिवंगत सैनिकों की स्मृति में

Pradeep Bhatt

67 कविताएं

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वतन के लिए है जीना और मरने की भी है ठानी
सिपाही हिंद का कहता यही है मेरी कहानी
है किसमें ताब जो आंखे उठाकर इस तरफ देखें
सूखा देगें हलक उसका मिलेगा उसको ना पानी
हमारी सहनशीलता को ना कमजोरी कभी समझो
उठाया खडग हमने गर ना मिलेगा हम जैसा सानी
जो है भूत लातों का वो बातों से ना मानेगा
सुनाओ उसको चाहे रोज़ तुम कितनी ही कहानी
न्यौछावर जान अपनी की हमारी जान की खातिर
नहीं भूल सकते हम ऐसे वीरों की कुर्बानी
वो खुश है मारकर चालीस जवानों को ‘प्रदीप’ गर
यकीनन हमारे हाथों से कब्र उसको है खुदवानी

-प्रदीप देवीशरण भट्ट-


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