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मेरे अल्फाज़

आज की सच्चाई

Prachi Deepak

18 कविताएं

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अब परिवार छोटे हुए जा रहे हैं
रिश्ते नाते खत्म हुए जा रहे हैं
ना चाचा ना ताऊ
ना बुआ ना मौसी
ना भाई बहन ही है
जाने कैसे नए युग में; हम जा रहे हैं
अब परिवार छोटे हुए जा रहे हैं

गाय हमारी अब मां हो या ना हो
पालतू अब हर घर में रखें जा रहे हैं
पहले दरवाजे पर लिखते थे सु़-स्वागत
अब कुत्ते से सावधान लिखवा रहे हैं

पत्तलों मे खाते थे पहले हम खाना
अब use & throw के दीवाने हुए जा रहे है
पहले गांवों की मिट्टी में स्वस्थ रहते थे सब
अब शहर के धुँए मे घुले जा रहे है

गांवों की हवेली अब भी वहीं है
पर शहर के दीवाने वहां कैसे आये
जिन्हें हवेली भी अक्सर लगतीं थी छोटी
वो अब 2 BHK में जिन्दगी जीए जा रहे है

हैं वो नादान ,उन्हें कौन समझायें
भला अपनों बिना भी खुशी होती हैं क्या
जो इंतजार में है उनके पास लौटो
तभी हर खुशी तुमको अपनी लगेगी
तभी जिन्दगी जिन्दगानी लगेगी
लौटेगा बचपन....लौटेगी जवानी..
तभी तो बनेगी एक नयी कहानी .....


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