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मेरे अल्फाज़

बँटवारा

Poet Shailesh

1 कविता

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बॅंटवारा

बात नई नहीं, ये बात बहुत पुरानी है,
थोड़े से शब्दों में, एक लम्बी कहानी है।

दो बच्चों की थी एक माॅं,
एक बच्चा हिन्दू और एक मुसलमाॅं,
दोनो गोद में माॅं की
खेले, कूदे, पले, बड़े हुए
अपने पैरों पर खड़े हुए।

माॅं की ममता का अमृत वो पी रहे थे
छोटे-मोटे झगड़ों के होते हुए भी
वो एक ही परिवार में जी रहे थे।

जीवन में अचानक उनके
कुछ फिरंगी आ धमके
करने लगे कोशिश
माॅं को उनकी
उन्हीं से छीनने की।

किसी की भी हो
माॅं तो आखिर माॅं होती है
प्यार, ममता, स्नेह समान भाव से
वो उन पर भी लुटाने लगी।

गैर थे फिंरगी
उसने फिर भी
उन्हें अपना लिया
उनकी हर गलती को छुपा दिया
हर अपराध को भुला दिया।

पर फिरंगी़!
फिरंगी तो आखिर फिरंगी थे
और फिरकी की तरह
घूमना उनकी आदत।

प्यार पर माॅं के
वो एकाधिकार करना चाहते थे,
ममता का माॅं की
वो प्यापार करना चाहते थे।

तभी नींद से हिन्दू जगा
और जगा मुसलमाॅं भी,
दोनो ने, लिया लोहा अग्रेंजों से,
कापी धरती कापाॅं आसमाॅं भी।

आखिर कर फिरंगी हारे
खुश हुए माॅं के प्यारे।

पर फिंरगी!
फिरंगी तो आखिर फिंरगी थे,
और फिरकी की तरह
घूमना उनकी आदत।

खाया, पिया, बाॅंधा, बटोरा
और मजा लिया लूट का
और जब जाने लगे
तब बीज बोया फूट का।

उस बीज ने फूट के
तुरन्त अपना काम किया
हिन्दू मुस्लिम दोनो ने
खूब कत्ले आम किया।

पानी सा खून बहा
और धरा लाल हुई,
हुए बच्चे अनाथ
माॅंए भी रोईं
और बहुएॅं भी
सफेद साड़ी में सोईं।


इस कत्ले आम से
पाया दोनो ने कुछ नहीं
बस खोया ही खोया था
माॅं तो खूब रोई ही थी
बापू भी बिलख-बिलखकर रोया था।

आखिरकर फिरंगियों ने
माॅं के शरीर को
टुकड़ों में काट दिया,
हिन्दू मुस्लिम दोनो में
उन टुकड़ो को बाॅंट दिया।

फिरंगी तो आखिर फिरंगी ही थे,
फिरंगियों जैसा ही
उन्होंने काम किया,
एक टुकड़े का हिन्दुस्तान
दूसरे को पाकिस्तान का नाम दिया

जब तक रहे यहाँ
चूसा माॅं का खून सारा
और जब जाने लगे
तो निचुडे़ शरीर का
वो कर गए बॅंटवारा।

#AzadAlfaz

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