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मेरे अल्फाज़

एथिस्ट.....

Piyush Bhaira

2 कविताएं

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मैं 'ना' कह देना चाहता था उसे,
चाहे उसे किसी ईश्वर ने घण्टों बैठकर बनाया हो,और रख दिया हो संसार की किसी भी कोख में।

उसकी आँखें गैस चैम्बरों में ले जाए गए उन यहूदियों जैसी थी ,जो कोने में छुपकर सोचते कि जैसे बचा लेंगे ख़ुद को।
और मैं हिटलर कि पार्टी के फौज़ी की तरह 'ना' कह देना चाहता था उसे।

वो अंजान शहर की गलियों में रही,
हाथियों, और तो और कुत्तों को भी चूमा उसने,
छोड़ कर उन साफ -सुथरे लड़कों को जो मछलियों की तरह किनारे पर आते थे उसके।
लड़के अक्सर सर्द मौसम है, जो किसी खिड़की पर औस की तरह आते हैं, जो पानी तो हैं, मग़र जिनसे कभी बादल नहीं बना करते

वो मेरा ईश्वर और मैं उसका धर्म होने की कोशिश।

ईश्वर कोई और नहीं एक औरत है, जो कुबूल करवा सकती है, आपसे 140 ख़ून और न जाने कितने सारे ज़ुर्म, रखकर अपना गरम और मुलायम हाथ आपके सीने पर जब जी चाहे।

चार घन्टे गौर से देखा  उस रोज़ उसे ,उसके छुए गए पर्दो और दीवार पर टंगी उसकी परछाई के ज़रिए, 'शेक्सपियर' और  'नेरुदा,  को अपने पैरों पर रख।
उसका हज़ारो सवाल वाला वो चेहरा......
मैं जब-जब उसे देखता तो जैसे इम्तिहान देता था कोई।

मैंने उसकी साँसे गिनी नींद में,
पर नसीब उसका, 120 बार धड़कता था दिल 1 मिनट में उसका।
न जाने कितनी सारी 'सभ्यताएं' बनती-बिगड़ती थी उसकी बन्द आंखों में।

मैं 'ना' कहने बढा था उसके घर की तंग गलियों से
उसकी काम वाली ने बताया वो जा चुकी है, अपना बायाँ हाथ  किसी के दाएं से पकड़े सफ़ेद घोड़े पर धुंए के ग़ुबार के बीच से गुज़र कर कहीं।

वो मेरा ईश्वर थी और उसके जाने के बाद से मैं नास्तिक हूँ।

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