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मेरे अल्फाज़

उन सा माहताब नहीं

Pavan Deepika

14 कविताएं

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निगाहें यार के सजदे हमें तो जब भी मिले,
बहार ए इश्क़ की दिल में हंसी कली भी खिले,
हिजाब ए हुस्न उठाओ न इस कदर से कभी
कहीं ख़ुदा भी तुम्हें देखकर नशे में चले।

मेरे सनम की निगाहों सा आफ़ताब नहीं,
हंसीन यार की सूरत सा माहताब नहीं।

गुले जहां में मेरे यार सा शबाब नहीं,
किसी चमन में मेरे यार सा गुलाब नहीं।

जब भी पियेंगे निगाहों से ही पियेंगे शराब,
नज़र के जाम सा मयखाने में शराब नहीं।

जहां की मुझको नज़र दोस्तों लगेगी नहीं,
हां उनकी पलकों से अच्छा कोई हिजाब नहीं।

जमाल ए हुस्न के उल्फ़त की आयतें है मिली,
पढूं किताब मैं ऐसी कोई किताब नहीं।

तुझे बहार की ख़ुशबू से हमनिसार किया,
करूं जो हम्द मैं दूजा कोई जनाब नहीं।

जहां में इश्क़ को तुमसे ही बेहिसाब किया,
अयां करूं मैं क्या उल्फ़त का कुछ हिसाब नहीं।

कनीज़ मेरी नज़र हो गयी है यार तेरी,
रहे तू पास मेरे मुझसे इज्तिनाब नहीं।

-- 'पवन"देहली"


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