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मेरे अल्फाज़

पत्नी.....एक मिट्टी की आकृति

ऋतु बाला

19 कविताएं

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मैं क्या हूँ ? एक मिट्टी की आकृति के सिवा,
जरा सी ठेस लगते ही बिखर जाती हूँ
गूंथकर फिर आँसुओं से उसी मिट्टी को,
देखकर तुमको हँसती हूँ मुस्कुराती हँ
तुम जो कहते हो कि रोक लो आँसुओं को,
आँसू नहीं निकले तो मिट्टी फिर कैसे गुंथेगी?
हँसी और आँसू का साथ है शाश्वत-
जैसे मेरा और तुम्हारा...
रोएगी नहीं 'अनमोल' तो बताओ फिर कैसे हंसेगी?

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