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Childhood

मेरे अल्फाज़

बचपन...

Parvat Shekhawat

2 कविताएं

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वो बचपन भी कितना प्यारा था, जब सारा जहां हमारा था
उसी उम्दा की कहता हूं, जो हमने भी गुजारा था
अभाव का तो कहना क्या, अभिलाषा पूरी होती थी
जब दिन खेल में होता था, और रात घर पर होती थी

बीते दिन की बयां कर दु, पोत मेरी भी होती थी
जब रात गोद में होती थी, और भौर पलंग पे होती थी
जिधर मेरा हाथ गया, वो दुकान मेरी होती थी
सुर चाहे जैसा भी हो, पर धुन मेरी होती थी

फिर क्या हम भी बड़े हुए, रुख के थोड़े कड़े हुए
जब बोए पेड़ आम के, ये बबूल कहां से खड़े हुए
जो जितनी पहले सुनते थे, वो आज भी उतनी सुनते हैं
अपनी दशा-दिशा बदली है, पिता तो वही फरिश्ते हैं

आशा और निराशा बदली, जीवन की परिभाषा बदली
यारी सारी अपनी थी, जो आज खासमखास बदली
खेत पहले भी जाते थे, जब मजा आता था रेत में
खेत आज भी जाते हैं, पर सन्न जाते हैं रेत में

बात घुमा कर कहना क्या, मैं सीधी बात बयां कर दूं
बिछड़े यार मिले मुझको, तो सब सब कुछ मैं कुर्बान कर दूं
बड़ा होने में क्या रखा है, मजा बचपन में होता था
खेल पर्वत भी खेला है, जब घर रेत का होता था

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