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मेरे अल्फाज़

उम्मीद का टुकड़ा

Parul Sharma

52 कविताएं

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मैं उम्मीद का एक टुकड़ा हूँ
जबकि दिल से टूटा हूँ,फिर भी पूरा हूँ
तुम सम्हाल कर रखना मुझे
अगर टूटुगा तो बिखर जाऊँगा दिल में
तुम बहा कर आँखों से दिल को हल्का कर देना
अगर तेरे दिये आकार में साकार हो पाऊँगा
तो जगमगाऊँगा तेरी आँखों में
ये टूटने बनने का सिलसिला यूँही चलता रहेगा
जैसे सॉसें रुक रुक कर चलती हैं
और धड़कनें भी तो थमथम कर चलती हैं
जैसे दिन रात होते हैं
जैसे सावन,भादों,बसंत पतझड़ भी तो होते हैं
सब दन एक से कहाँ होते हैं
तुम कभी न छोड़ना मुझे
क्योंकी मैं जीने की उमंग हूँ
जिन्दगी की तरंग हूँ
मैं ही हूँ जो सपना दिखाती हूँ
और मैं ही किसी भी पल हौसला बन जाती हूँ
हाँ बस धैर्य रखना है तुम्हें
सजो कर रखना तुम मुझे दिल में, मनमें,
सपनों में,नज़रों में या अपनों में या सब में
जो भी जगह तुम्हें बहतर लगे,पर रखना जरूर
अगर मेरा अवशेष भी शेष रहेगा
तो वह अंकुरत हो तुम्हें फिर से जीवित कर देगा

- पारुल शर्मा

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