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मेरे अल्फाज़

जहाँ मान नहीं ठहरें क्यों

Parul Sharma

52 कविताएं

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जहाँ मान नहीं ठहरें क्यों 
जहाँ प्रेम नहीं झुकें क्यों 
जहाँ नहीं दो बातें सत् की
व्यर्थ के विवाद करें क्यों 
चट्टान को ढेर कर सकते हम
दरिया पार कर सकते हम
नभ की ऊँचाई क्या है
सागर की गहराई क्या है
दिलों की ऊँचाई गहराई छू सकते हम 
आखिर फिर रुकें क्यों
आखिर फिर झुकें क्यों
निराशा के अंधकार में सिमट कर छिपें क्यों 
जहाँ धर्म(मानव) नहीं टूटें क्यों
जहाँ कर्म नहीं मिटें क्यों
जहाँ नहीं दो बातें न्याय की
मौन हम रहें क्यों मौन हम रहें क्यों मौन हम रहें क्यों

- पारुल शर्मा

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