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मेरे अल्फाज़

कहां है वो पेड़?

Pankaj Pundir

2 कविताएं

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जाते हो ना ऊटी, कोडैकनाल, शिमला, मनाली
हरिद्वार, ऋषिकेश घूमने।
क्या देखने जाते हो?
बताओगे मुझे? बस ऐसे ही जानना था मुझे,
क्या कहा? सुनायी नहीं दिया मुझे?
थोड़ा ज़ोर से बोलेंगे आप?
“पर्वत नदियां झरनें जंगल” हां सही एकदम,
जानते हो जो इन सबको जोड़े रखता है,
सुंदर बनाए रखता है सजाये रखता है,
समतल पर रहने वाले प्राणी,
हां वही एक पेड़ मिला था तुझे, समझ आया?

क्या क़सूर था उसका? बताओगे मुझे?
वो बस चुपचाप था स्वभाव से शांत था?
तुम्हारे हर रूख़े व्यवहार को अनदेखा कर
तुम्हारे हर दिए घाव को बार बार भर कर
वो था खड़ा धूप में तेरी ठंडी छांव बनकर
कभी तू धूप पा सके पत्ते गिरा दिए ये सोचकर
कहां है वो पेड़ बताओगे मुझे?

समतल पर रहने वाले प्राणी,
क्या क़सूर था उसका? बताओगे मुझे?
वो बस रास्ते में खड़ा था तो काट डाला
लकड़ियां बेच दी बचीं तो जला डाला
तुम इंसानों से मैं इंसान ना होना ही सीखूंगा
तुमने हां तुमने सिर्फ़ तुमने धरती को बंज़र,
हवा को धुआं, पानी को ज़हर बना डाला,

सोचना कभी तो क्या कर सकते हो?
आज तक धरा से तुमने सिर्फ़ उपहार लिए हैं,
इसने मांगा तो नहीं पर क्या कुछ दे सकते हो?
ज़रूरत है पर तुम भागीरथ नहीं बन सकते हो,
फिर भी पर्वत नदियां झरनें जंगल सब बचा सकते हो,
तुम श्वास पा रहे हो ये प्रमाण है के कुछ बचें हैं,
अब कुछ को तुम कटने से बचा सकते हो
और आज कम से कम एक पेड़ लगा सकते हो ..


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