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मेरे अल्फाज़

एहसास

Pallavi Sriwastav

1 कविता

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डरती थी मैं कुछ वक़्त पहले तक इन ख़ामोशियों से,
अब तो करती हूं इंतजार इन अनचाही ख़ामोशियों की,
क्यूंकी इसमें तुम आते हो मेरे पास दूर रह कर भी,
बातें करते हो मेरे मन से बिन बोले भी,
छूते ही मुझे अपनी स्यामली उंगलियों से न छूकर भी,
महसूस करती हूं स्पर्श तुम्हारा शर्माते हुए तुम्हारे ना होने पर भी,
फिर बिखेर कर मेरे चेहरे पर सुबह की हंसी,
गुम ऐसे ही जाते हो मानो अभी जगी हूं सपनों से,
फिर वही खामोशी, वही इंतजार लेकिन कुछ अलग सा एहसास,
जहां डर नहीं की कोई छीन लेगा तुम्हें मुझसे,
क्यूंकि यहां तुम्हें बुलाती भी मेरे एहसास ही जताती है
हक तुम पर मेरे एहसास ही,
कोई कैसे छीन सकता है मुझसे मेरे एहसास को ,
ना तुम ना कोई और, इस एहसास - इंतजार पर सिर्फ हक है मेरा।

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