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मेरे अल्फाज़

उमंगे दे गई दरखास्त सी

P Rai

30 कविताएं

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"

((उम्र का तीसरा पड़ाव))

चार दिन की ज़िन्दगी
थोड़ा विश्राम करले
साँसो के समीप बैठ मेरे
थोड़ा आराम कर ले |

दिन ज़िन्दगी का
तीसरा आया
आपा धापी में
हमने '
क्या खोया'
क्या पाया ?

तुम ,तुम ना रही'
मैं, मैं ना रहा ,
बच्चों की
ख्वाहिशें पूरी करने में ,
तुम कुछ धागे
बुनती रही '
मेैैैं फटे हालात
ज़िन्दगी सीता रहा।

इन सब कोशिशों में
ज़िन्दगी
भीतर से निकल कर '
आहाते में आ गई
कुछ सलवटे चेहरे पर '
लकीरे सी बना गई

समय की बदनसीबियों के
कुछ पल
अनजान से निकले
भले ही उन्हें
रोले,
या उन्हे , हँसले ।

खीच के ' तानती रही
ज़िन्दगी हमें '
समझते , समझाते,
भीगे अरमान जो
आंसूओं का दरिया बने
न कभी सूखे,
न कभी सूख पाते|

शामें उम्र की
आस पास थी
उमंगें छूट्टियों की
दे गयी ",
लम्बी दरख्वास्त सी |

अपने जो पराये हो गए
रिशते मजबूरियों में
मानों
निभाए हो गए।

बीते दिनों को य़ाद कर
आज भी हम
आहें भरते |
खुशियों की क्या ,सौगातें थी
फूहारों की तरह
बहते
कभी झरनों की तरह
एक दूजे में झरते |

काश आ जाए
वो हसीन पल ,
तो फिर ,
बाहों में भरलें ।
साँसों के समीप बैठ मेरे
थोड़ा विश्राम करले|

पी राय राठी
भीलवाड़ा, राज



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