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मेरे अल्फाज़

खरीदतें सपनें भरी दुपहरी

P Rai

20 कविताएं

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खरीदतें सपनें भरी दुपहरी

ना समय ठहरा
ना उम्र ठहरी
फिर भी खरीदतें है,
सपनें भरी दुपहरी
मेहंदी को तो उतरना ही होता है
रची बसी
हाथों में ,कितनी भी गहरी।

हम जीवन के मोह बंधन सें
कितने बंधवा,
एक दिन, जैसे सुहाग भरा
बाकी के दिन लगते हों, सब विधवा
दिन ढल जातें,
रातें काली ओैर गहरी
खरीदतें सपनें भरी दुपहरी

मेहंदी को तो उतरना ही होता है
रची बसीं हाथो में ,
कितनी भी गहरी।

मोह माया तो सिर्फ एक रात दूल्हा
एक रात की दुल्हन है ।
दुःख सुख में देखों आपस में ही'
कितनी अनबन है।

चाहत तो बस , मृगरीचिका ठहरी
उतरना ही होता महंदी को तो,
रची बसी हाथो में
कितनी भी गहरी।

झूठे है दर्पण ,,झूठे है
श्रृंगार सभी
किन्तु हम ,
न सुलझने को तैयार कभी।
दुःख के आँसू. पल पल
कान्हा याद दिलाते तेरी "।

मेहंदी को तो उतरना होता है
रचीबसीं हाथों मे कितनी भी गहरी ।

🙏
रचनाकार
पी राय राठी
भीलवाड़ा राजस्थान
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