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मेरे अल्फाज़

चाहतों में क्यूँ मर जाना बहुत

P Rai

29 कविताएं

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ये जख्म दिल का पुराना है बहुत
मेरी हसरतों का ठिकाना है बहुत।

बुझा कौन इसमें पानी पानी होकर
हवाओं से ही जलजाना है बहुत।

सिवा तेरे कोई याद नहीं रहता
कहते लोग ये दीवाना है बहुत।

कहकशाँ से उतार लाया जमीं पे
महबूब का नूर सुहाना है बहुत।

गुलबदन से फ़िजाए मस्त हो उठी
नामालूम कौन मस्ताना है बहुत।

तुझसे मिली जीने की कूबत तो,
चाहतों में क्यूँ मरजाना है बहुत।

ये दिल भी बिन आपके लगता नहीं
'#राय, दिल्लगी को समझाना है बहुत।

पी राय राठी
भीलवाड़ा, राज

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