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मेरे अल्फाज़

अनकही मोहब्बत

omkumarom om

17 कविताएं

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तुम इतना,
कम समय दिए मुझे,
कि मिलकर भी नहीं लगा,
मैं तुमसे मिला हूँ।

जब तुम मेरे सम्मुख हुए तो,
एक पल को,
मैं समझ ही नहीं पाया,
कि तुझे गले लगाऊं।

या तेरे माथे को चूमकर,
मैं तुझे आशीष दूँ
सबकी निगाहें भी,
हमारी तरफ ही थी।

मैं बेचारा,
करता भी तो क्या करता।
कुछ समझ नहीं पाया,
बस उलझकर रह गया।
जैसे कोई मकड़ी,
अपने ही बुने जाल में,
उलझ कर रह जाती है।

ढेर सारी बातें थी,
करने को तुझसे
तुमने भी,
कहाँ कही अपनी दिल की?
तेरे भी दिमाग में,
कुछ चल रहा था शायद।

दिल में हजारों अरमां,
करवटें ले रहे थे
पर तुम भी खुल कर,
पेश कहाँ आये मुझसे?
बस अपनी,
कशमकश को,
किसी तरह,
सँभालते रहे खुद तक।

और हल्की सी मुस्कान,
अपने होठों पर ले आये
तुम मुझे देखते रहे,
ललचाई नज़रों से।

और मैं भी तुझे,
बस निहारता ही रह गया
तेरे कांधे पर मैंने,
अपना हाथ रखा।

और बस,
इतना ही पूछ पाया,
कैसे हो?
तेरा भी बस तो टुक,
जवाब था, हां ठीक हैं।

रात को तेरा मैसेज मिला,
कल आपका क्लास है ?
मैंने कहा हाँ .......
आपका जवाब था,
ठीक है, मैं नहीं आऊँगा।

मैं समझ नहीं पा रहा था,
जोर-जोर से हँसू या,
तेरी बातों पर गुस्सा करूँ ?
अरे ये भी कोई बात हुई,
उम्मीदें थी आप आओगे,
जी भर देखूंगा आपको ....
इतने दिनों बाद मिले हैं,
पर सबके सब अरमां,
टूट कर रह गए
किसी कांच सा।

इस मोहब्बत का क्या नाम दूँ,
मैं समझ नहीं पाता ?
कितना अजीब लगता है न,
इतने दिनों के बाद हम मिलें,
फिर भी आधे-अधूरे।

मन की बात,
मन में ही रह गयी,
मेरी भी और तेरी भी......
आखिर क्यों ऐसा होता है ?
चाहकर भी,
कोई इंसान किसी से,
खुलकर क्यों नहीं मिल पाता है?
क्यों ये झूठी दीवारें है ?
दुनिया की ये खोखली,
रश्म-रिवाज, दकियानूसी बातें,
मेरी समझ से परे है।

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