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मेरे अल्फाज़

ढल रही धूप,संध्या आ रही

Om Prakash Shrivastava

38 कविताएं

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ढल रही धूप ,संध्या है आ रही ,
संग अपने संदेश हजार ला रही।

संध्या के आगमन को रविकिरण सिमट रही,
इस धरा को कुछ समय के लिए है छोड़ रही,
एक संदेश परिवर्तन का है जग को दे रही,
प्रकाश-अंधकार सदैव सच्चाई जीवन की रही।

ढल रही धूप ,संध्या है आ रही ,
संग अपने संदेश हजार ला रही।

हो रही संध्या चांदनी की बारी आ रही,
घोर तम में भी प्रकाश की आशा बन रही,
गौर से देखो सितारों से नभ जगमगा रही,
सोचो बिना रवि के भी धरा प्रकाश पा रही,

ढल रही धूप ,संध्या है आ रही ,
संग अपने संदेश हजार ला रही।

खग की टोली संध्या को निहार रही,
आशियाने में पहुंचने की लालसा आ रही,
अपनों से मिलन कि आस है दिल मे छा रही,
होकर के भी अंधेरी ,निशा है सबको भा रही।

ढल रही धूप ,संध्या है आ रही ,
संग अपने संदेश हजार ला रही।

संदेश संध्या का का 'ओम' वाणी है बता रही,
सुख दुख की जोड़ी ब्रह्म से ही आ रही,
चक्रव्यूह कितना ही हो राह सदा बनी रही,
दुख ही है सदा से, सुख की लाठी बन रही।

ढल रही धूप ,संध्या है आ रही ,
संग अपने संदेश हजार ला रही।

- ओम प्रकाश श्रीवास्तव

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