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मेरे अल्फाज़

हत-प्रभ भारतमाता

Om Gopal

36 कविताएं

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दिशाहीन जहाँ का यौवन है,
दिगभ्रमित जहाँ नर-नारी है।
हतप्रभ भारतमाता है,
विश्व गुरू बनने की तैयारी है।

लोकतंत्र, पर्व हम मना रहे,
मुद्दों का अकाल, भारी है।
किसे वोट दें, काहे वोट दें,
इस बात पर मंथन जारी है।।
हतप्रभ भारतमाता है----

नायक में छिपा, खलनायक है,
भाषा अभद्र -दुखदायक है।
शत्रु समान व्यवहार यहां,
आरोप -प्रत्यारोप जारी है।।
हतप्रभ भारतमाता है ----

क्षमताओं का नहीं ग्यान जिन्हें,
अभ्रदताओं का अभिमान जिन्हें।
आत्म-चिंतन कभी किया नहीं,
पी. एम. बनने की तैयारी है।।
हतप्रभ भारतमाता है -----



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