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मेरे अल्फाज़

अकेले चलना तू न बदलना

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18 कविताएं

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अकेले चलना
तू न बदलना
खुद ही ज़माना
बदल रहा है।
मन तो सबके
चंचल होते
किसी किसी का
मचल रहा है।
रात जा रही
भोर हुआ है
तभी अकेले सूरज भी
धीरे धीरे निकल रहा है।
निशा का छाये जब अँधियारा
करते हैं आराम सभी
फैलाने को स्वयं रोशनी
चाँद गगन में चमक रहा है।
जिद पर अड़ा है
कोई यहाँ पर
स्वयम् ही कोई
बहल रहा है।
कुटिया में छायीं हैं खुशियां
नहीं मकां में चैन है
किसी किसी के दुख का कारण
अच्छा-खासा महल रहा है।
गलत नहीं है सहना तुमको
मन में ठान ये लेना है
सही बात पर ही लोगों का
सबसे ज्यादा दखल रहा है।
नहीं जीतेगी भीड़ हमेशा
सत्य जीत की ताकत है
अपनी शक्ति पहचाने जो
सदा समर में सफल रहा है।


ओम प्रकाश वर्मा,
194,राधिका विहार,
मथुरा-281004.


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