आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Hanfti Nadi

मेरे अल्फाज़

हांंफती नदी

64 Views
कविता- 'हांफती नदी'

जब से
मनुष्य ने
मुझे बांध लिया है,
तब से
मेरा अस्तित्व
घटने लगा है ।
जब से
मेरी विशाल
जल राशि में
मनुष्य के
दोहन की
मथानी चलने लगी है,
तब से
मेरी आभा
गंदली होने लगी है ।
धीमी हो गयी है
मेरी
बहने की चाल,
बंद हो गयी है
मेरी
कल-कल की आवाज ।
जब से
मनुष्य ने
मुझे
बांध करके
फैक्ट्रियां चलायी हैं
मेरे ही जल से
बिजली बनायी है,
तब से
मेरे आगोश में
पलने वाले
जीवों पर
खतरा मड़राया है।
मेरे
शीतल जल में
बड़े-बड़े
उद्योगों का
जबसे
कचरा बहाया गया है,
तब से
मेरा
स्वच्छ जल
जहर बन गया है।
निकली थी
पहाड़ों से
जब मैं
अन्तर-मन में
सपनों को संजोए
नहीं पता था
कि
फिर फंस जाउंगी
मतलबी
मनुष्यों के भवर में ।
लगता है
जीवन में
मेरे बंधना लिखा है,
जन्म से लेकर
आज तक
मुझे
कई बार
बांधा गया है ।
सर्व प्रथम
ब्रह्मा के
कमण्डल में बंधी हूं
दूसरी बार
शिव की
जटाओं से घिरी हूं ।
तीसरी बार
मनुष्य के
हाथों में बंधकर
घुट-घुटकर
अपने
अन्तिम दिनों के
पल गिन रही हूं ।
गिड़-गिड़ाकर
लोभी मनुष्य से
आंचल में
पलने वाले
जीवों के
जीवन की
भीख मांगती हू्ं ।
अपना
शीतल जल
और
पुरानी
तीव्र गति की
चाल मांगती हूं,
विस्तृत
भूखण्ड पर
स्वच्छंद होकर
घूमना चाहती हूं ।
अब
अपने
बंधक से
आजाद कर दो,
सूखी हुई
नदियों की
प्यास बुझाने दो ।
बहने दो
वेग से
आसमान की
छाया में
बहुत
दुह चुके
तुम
मेरे स्वच्छ जल को ।
बहुत
थक चुकी हूं
तुम्हारे कहर से
दब गयी हूं
तुम्हारे
मैं
कचरे के नीचे ।
हांफ-हांफकर
रुकी हुयी
सांसे मांगती हूं ,
घटते हुए
अस्तित्व को
बचाने की
तुमसे
अरदास कर रही हूं ।   


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!