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मेरे अल्फाज़

ये रिवाज़ है

Noopur Pathak

3 कविताएं

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ये रिवाज़ है !

ये नहीं सुनते...
न तेरी,न मेरी;
न कल की,न आज की।
क्यूँकि,
ये रिवाज़ है

ये नहीं सुनते...
दिल में दुबकी हुई;
सहमी-सिसकती हुई आवाज़ को।
क्यूँकि,
ये रिवाज़ है

ये नहीं सुनते...
इन पलकों से टपकते टेसुओं की टीस को;
गले में फँसे, ज़ुबान तले दबे अल्फ़ाज़ को।
क्यूँकि,
ये रिवाज़ है

ये नहीं सुनते...
चूड़ियों की ख़रोंच को;
ख्वाबों का पीछा करते मिजाज़ को।
क्यूँकि,
ये रिवाज़ है

ये नहीं सुनते...
प्यार की मीठी बोलियाँ;
अपनेपन के साज़ को।
क्यूँकि,
ये रिवाज़ है

ये नहीं सुनते...
मेरी उपलब्धियों की कहानियाँ;
मेरी लिखावटों के अंदाज़ को।
क्यूँकि,
ये रिवाज़ है

ये नहीं सुनते...
क्यूँकि ये सुनना ही नहीं चाहते।
क्यूँकि...
हमें यही सिखाया गया है;
बचपन से बताया गया है;
यही हमारे ‘रिवाज़’ है

पर ये रिवाज़ भी तो बड़े ढीठ है...
इन्होंने अपने कानों में शायद रूई का गट्ठा ठूस लिया है;
और अपने दिल को पत्थर कर लिया है..

ताकि;
किसी की बेबसी की आहट ये न सुन सके
न ही इन्हें उसका ‘अहसास’ हो।

- नूपुर पाठक

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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