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मेरे अल्फाज़

घर अनजाना शहर कितना भी,

Nivedita Singh

18 कविताएं

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अनजाना शहर कितना भी,
जाना-पहचाना क्यों न बन जाए
अपरिचित पराये लोग कितना भी,
अपनापन क्यों न बरसायें
घर अलहदा ही होता है,
अजब सुकून दिल में घोलता है
बेहद महफूज महसूस कराता है,
खुद के वजूद का दीदार कराता है
हम जैसे हैं वैसे ही मुकम्मल लगते हैं,
कुछ प्यार निःस्वार्थ बेशर्त जो होते हैं
सोचना समझना नहीं वहाँ पड़ता,
कोई चेहरा नकाब ओढ़े जो नहीं होता,
अकेला कोना वहाँ भी है मेरा
पर तन्हाई में डूबा नहीं होता,
महीनों से आशियाना है मेरा यहाँ
बस घर का एहसास कहीं नहीं होता।

©निवेदिता

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