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मेरे अल्फाज़

जख्म

Niti Sharma

1 कविता

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एक वक्त था जब पराए जख़्म देते थे
ओर कोई अपना अाकर मरहम लगाता था
सांत्वना मिलती थी,
ओर एक आज का समय है
जब अपने ही जख्म देकर पूछते हैं
अरे भाई दर्द तो नहीं हुआ

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