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मेरे अल्फाज़

आहत राष्ट्रभाषा

Nisha Aggarwal

1 कविता

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अपने ही घर के एक कोने में
बरसों से उपेक्षित
हीन भावना से ग्रस्त
अपनों की सताई हुई मैं
ख़ामोश बैठी खून के आंसू रो रही हूं
मृतप्राय सी हूं मैं
सिर्फ आती जाती सांस ये याद दिलाती है के
मैं जिंदा हूं
मेरे चारों तरफ उदासी है, मायूसी है
मेरे वजूद को छोटा समझते हैं
मेरे अपने......
मेरे स्वरूप को विकृत कर देने वाले भी वही है
मेरे साथ चलना, मेरा हाथ थामना
उनकी शान के खिलाफ है
अपनों के बंधनों में जकड़ी हुई मैं
आज बिल्कुल विवश हूं
इतना अपमान सहकर भी ख़ामोश हूं
जानते हैं क्यों ?
प्रतिशोध लेना मेरा स्वभाव नहीं है
वो भी अपनों से
नहीं.......
मैं तो उस दिन की बाट जोहती हूं
जब मेरे घर में मुझे सम्मान मिलेगा
मेरा खोया हुआ आदर-मान मिलेगा
मेहमानों काल आदर तो होगा
पर अपनों काल निरादर नहीं होगा
पर न जाने वो दिन कब आएगा
उस दिन की राह में पलकें बिछाए
जानते हैं आप मैं कौन हूं ?
मैं हूं अपनों से उपेक्षित , तिरस्कृत
अपने हक की लालसा में चिरप्रतिक्षित.....
अपने गुमशुदा अधिकार की है जिसे अभिलाषा
अपने ही जिसके देख रहे हैं जिसकी बरबादी का तमाशा
मैं हूं वो व्याकुल,आहत राष्ट्रभाषा.....

-निशा अग्रवाल

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