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मेरे अल्फाज़

उसके लिये जीना फिर से आसान हो गया...

nilabh singh

2 कविताएं

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उसके लिये जीना फिर से आसान हो गया
ख़ुदा बना फिरता था ,अब इंसान हो गया।

इस शहर में रहते थे अमीर या ग़रीब
अब कोई हिंदू या फिर मुसलमान हो गया।

इतनी ऊंची दीवारें,उसकी कोठी ढंक गयी
उसका घर होगा,हमारा आसमान हो गया।

ख़्वाहिशों का वज़न ये शहर ढो नहीं पाता
यहां का हर मोहल्ला सुनसान हो गया।

कितने अरमान कितने राज़ दफ़न होंगे
कमबख़्त दिल न हुआ,क़ब्रिस्तान हो गया।

न जाने किस डर से लोग भीड़ बन गये
क्यूं इतना खौफ़ज़दा 'इंसान' हो गया।


उपरोक्त रचनाकार का दावा है कि ये उनकी स्वरचित कविता है। 
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