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मेरे अल्फाज़

चांद की शिकायत

Nikhil Mishra

2 कविताएं

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छत पर चांद रात भर 
अठखेलियां करता रहा
खींचे उसने बाल
मिटा दिए काजल 
और चूड़ीयाँ भी छीन लीं

दबे पाँव न जाने कब
आ गया ठीक उसी वक्त
जब चुपके से तुम्हारे ख्याबों का
इंतजार कर रही थी आंखें
झकझोर कर जग दिया
तुम्हरे अधिकार से

पूछ रहा था मुझ से
मेरे चेहरे में क्या दीखता है
उसे पता है इस यौवन में
चांद पिया सा लगता है
मैं दुपट्टे में छुप गई शरमा कर
मुस्कुराता रहा वो पागल

जबरदस्ती बंद कर आँखे मेरी
कान के पास
बहुत पास आ कर पूछा
मुझ से प्यार करती हो?
मेरी खामोसी पर हंसा
इंकार पर ठहाके भी लगाए

हाँ याद आया कल रात
तुम्हारी याद में चांद को
निहारती रही एकटक
शायद इसी लिए
छत पर चांद रात भर
अठखेलियां करता रहा
खींचे उसने बाल
मिटा दिए काजल
और चूड़ीयां भी छीन लीं

- निखिल मिश्रा

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