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मेरे अल्फाज़

बच्चे वाला दिल

Nikhil Kumar

29 कविताएं

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किसी को खुदा मान के क्या झुक गए
किसी की मोहब्बत देख क्या रुक गए
पैगाम जिंदगी का समझ क्या पढ़ गए
साहब हम तो खुद की खुदी से हट गए

माना कि खुदा का दिया है हमने उसको दर्जा
फिर क्यों रहमत के लिए तरसे उसका बंदा
आस जो अब हम लगाए तो उसमे गलत है क्या
नजरे मिला के नजरे न मिलाए तो उसकी रजा है क्या

मोहब्बत को हमने जब तलक न गले लगाया
सुकून से भरे हर पल और चैन का था साया
मै तो अपनी ही खुदी से हट गया
मोहब्बत देख उसकी क्यों रुक गया

गलती की ये हमने पैगाम जिंदगी का समझ पढ़ गए
माना था जिसको खुदा उसके हाथों ही लुट गए
चिट्ठी किसी ओर की अपनी समझ पढ गए
लुटना तो था ही देख उसको जो ठिठक गए

मोहब्बत का दरिया कुछ ऐसा ही होता है
हँसी आती है जँबा पर और दिल रोता है
लेकिन साहब यँहा थोड़ा टिवस्ट है
ये जो दिल है ना बच्चे का सा होता है
कल फिर किसी और टॉफी को पाने के लिए
हाथ फैलाए खड़ा होता है.

निखिल कुमार 

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