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Sachaa jhutha kaisa bhe rakhta tha..

मेरे अल्फाज़

सच्चा झूठा कैसा भी

Nihal Modi

3 कविताएं

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सच्चा झूठा अपना पराया कैसा भी रखता था,
मैं हरदम एक सा ही चेहरा रखता था..

दुनिया मिले मुझ से बिगड़े मुझ से मुझे गम कहा,
मैं सदा अपना ईमान सच्चा ही रखता था..

यह तो सियासत ने थमा दिए हाथों में खंजर वरना,
कभी इन हाथों में मैं फूल भी रखता था..

आब उकेलती जमीं ये कह के अब,
था एक शजर जो मुझ पे साया रखता था..

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