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मेरे अल्फाज़

एक सत्य

Neha Singhal

6 कविताएं

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ऐ बंदे तू क्यों इतराए झूठी शानो शौकत पर
मिट्टी का है सब कुछ यहां तू क्यों डरता है खोने पर
भागता रहा जीवन भर जिस दौलत को पाने को
पाकर उसे आज खड़ा अकेला नहीं कोई साथ निभाने को
सोच ज़रा क्या कमाया तूने क्या तेरे हाथ आया है
बिना रिश्तों के हर पैसा ज़ाया है
करता रहा तू मेरा तेरा डाले अपने जज़्बातों पर पहरा
आज बैठा बूझ रहा है लाखों की भीड़ में अपनों का चेहरा
यह जीवन एक घना तरुवर और तू केवल एक शाख है
क्यों भूल गया तू आखिर अंत में तू भी राख है

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