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Nisha Kyun Nahin

मेरे अल्फाज़

हमारी पाठक नीतू सिंह पूछ रही हैं, निशा क्यूं नहीं

Neetu Singh

60 कविताएं

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निशा क्यूँ नहीं 

सूरज के आगे सिर नवाते हैं
कहने वाले यह बताते हैं
कि वह अंधेरा भगाता है
और यूँ दिन बदल जाता है

पूंछती हूँ आज मैं यह
खोलकर के राज़ मैं यह
कि निशा सूरज को है खाती
भागता है देख उसे वह

एक क्षितिज से निशा, जब झाँकती है
घूर के जब गगन में, वह ताकती है
सिमट है जाता, सूरज गगन पर
दूसरे क्षितिज से किरण भी, भागती है

फिर उसे क्यूँ देवत्व हासिल
क्यूँ भला प्रार्थना के काबिल
क्यूँ उपेक्षित फिर भला है
जगमगाती रात झिलमिल

निशा तो है, शाम देती
जगत भर को, आराम देती
बहाकर शीतल बयार
काम को दिन के, विराम देती

इतने पर भी उसे कोई घमंड नहीं
सूर्य जैसी निशा, यूँ प्रचंड नहीं
पूजनीय फिर निशा क्यूँ नहीं
जब सूर्य सा देती, कोई दंड नहीं

- नीतू सिंह 

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