मिर्जा ग़ालिब की याद

                
                                                             
                            जाहिद शराब पीने दे मस्ज़िद में बैठकर,
                                                                     
                            
या वो जगह बता जहाँ खुदा नही।।
(मिर्जा गालिब)

मस्ज़िद खुदा का घर है, पीने की जगह नहीं
काफ़िर के घर में जा, वहाँ खुदा नहीं।।
(अल्लामा इक़बाल)

काफ़िर के दिल से आया हूँ, मैं ये देखकर,
खुदा मौजूद है वहाँ, पर उसे पता नहीं।।
(अहमद फ़राज़)

है पता उस काफ़िर को भी, कि मौजूद है खुदा यहाँ भी
पर बेहतर है नासमझ लोगों को ये समझाना कि मुझे खुदा का पता नहीं।।
(नीरज कुमार समस्तीपुरी)


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
  
1 year ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
X