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मेरे अल्फाज़

भूत था.. या कोई पथिक

Neena Sinha

23 कविताएं

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भूत था.. या कोई पथिक!!!
दिन थे हमारे कॉलेज के
हॉस्टलों वाले,
पढ़ने का मूड ना था,
दोस्तों के संग थे बैठे- ठाले।
उड़ा रहे थे हम बेपर की
बहादुरी के हाँके जा रहे थे किस्से।
मैंने कहा, डर का लेश मात्र भी
आया नहीं है मेरे हिस्से।
दोस्तों ने कहा डींगे मारा ना करो,
ऐसा है तो जाकर भूतों से मिलो।
हॉस्टल के बगल में था एक
बड़ा सा कब्रिस्तान,
रात में हुआ करता था
बिल्कुल ही सुनसान।
कहा जाता था, भूतों का डेरा।
दोस्तों ने कहा, जाओ, लगाओ
वहाँ का एक फेरा।
शेख़ी बघारी थी, हो गया मुफ्त में
बखेड़ा।

मैंने भी बनाया अच्छा सा
बहाना…
कहा… जब होगी अमावस्या
की रात,
सूझेगा न हाथों को हाथ।
उसी दिन मैं जाऊँगी
कब्रिस्तान।
ख़ौफ़ का नहीं है मुझ में
नामोनिशान।
कहा दोस्तों ने ,
कब्रिस्तान की वीरानियाँ,
देख उसे तू बना रही
कहानियाँ????

बदकिस्मती देखो मेरी ,
तभी पड़ने लगी बारिश की बूंदे!
मौसम भी हुआ बदहाल
डर ने किए बुरे हाल मेरे।
रीढ़ में दौड़ गई एक झुरझुरी,
सर्दी में भी लगने लगी गर्मी।
मैंने बनाए अनेक तगड़े बहाने,
दोस्त भी थे मेरे बड़े सयाने।
बोले जा.. लगा आ कब्रिस्तान
का फेरा!
लौटी सही सलामत
कल का दिन तेरा।
देंगे तुझे तेरी मनपसंद ट्रीट।
मन में आया कब्रिस्तान का
लगा लूँ बाहर से चक्कर,
करूँ दोस्तों को चीट।

दोस्त भी थे मेरे बड़े स्मार्ट,
बोलीं, दूसरे गेट पर हम करेंगी
तेरा वेट।
घुस एक गेट से, निकली अगर तू
दूसरे गेट से, तभी मिल पाएगी,
कल ट्रीट।
मरती क्या ना करती…..
हनुमान चालीसा याद कर,
रखे कदम कब्रिस्तान के अंदर।
पैर हो गए थे मनों भारी, डर कर।
साँसें चल रही थीं, थम थम कर।
सहमी हुई नजर डाली इधर-उधर,

बढ़ाए अपने कदम,
कब्रिस्तान के बीच वाले रास्ते पर।
सोचा था, आँखें करूँगी थोड़ी बंद,
रखूँगी थोड़ी सी खुली।
निकलूँगी कब्रिस्तान से,
पहले कि भूतों को पता चले।
डर से, खुद के पदचाप भी
पड़ रहे थे सुनाई मुझे।
खाई कसम कि बच गई तो
डींगे मारने की आदत,
दूंगी विदाई इसे।

पर आज जो शामत आई,
कुछ नहीं हो सकता भाई।
पहुँची कब्रिस्तान के बीचो-बीच,
नजर पड़ी, एक कब्र के ऊपर।
ठिठक गए मेरे कदम,
मैंने उस इंसान से पूछा जाकर।
पागल है क्या भाई!
रात में बैठे हो एक कब्र पर।
तेरे अलावा दिख रहे हैं यहाँ
सिर्फ और सिर्फ चमगादड़।
रात में तो यहाँ भूले से भी
कोई नहीं फटकता।
तू यहाँ क्यों बैठा है
क्या तुझे डर नहीं लगता????
बड़ा अजीब था वह इंसान
सुनते ही ऐंठ गया।
घूरा मुझे, फिर बोला..
कब्र में गर्मी लग रही थी;
सो मैं बाहर आकर बैठ गया।
सुना मैंने, काटो तो खून नहीं
घुट कर रह गई चीखें गले में।
मैं काँपती हुई वहीं बैठ गई।

हुआ क्या उसके बाद
नहीं है, ठीक तरह से याद।
सुध लौटी थोड़ी तब,
जब दोस्तों ने दी मुझे आवाज़।
थक कर निकले थे
ढूंढने मेरे दोस्त मुझे, कर इंतजार।
कब्र पर बैठा हुआ इंसान
फिर दिया नहीं दिखाई।
बताया दोस्तों को,
तो वे ठहाके लगाकर हँसी।

लौटी मैं उनके साथ हॉस्टल
सोचती रही रात भर।
क्या सचमुच मैंने भूत देखा था
या था कोई पथिक।
या फिर डर की इंतहा थी,
या फिर मेरा कोई दिवास्वप्न।
जो हो, रूह काँप जाती है,
कब्रिस्तान का नाम लेते ही।
हो सकता है यह भी,
रहा होगा कोई पथिक,
डरा हुआ देख मुझे
की होगी उसने ठिठोली।
अंजाना सा वह….
भूत था या कोई पथिक।

नीना सिन्हा। 

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