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मेरे अल्फाज़

उलझन

Neelam Narang

8 कविताएं

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चुटकी में जो करती थी
हर पहेली का हल
धागों की उलझनों को
समझ जाती थी पल में
गिन लेती थी उड़ते पंछी के पर
आज बेबस हूं
अपनी ही ज़िन्दगी की
पहेलियों को सुलझाने में
उलझ गई है धागों की तरह
ज़िन्दगी
जिसका एक सिरा तो मेरे हाथ में है
और दूसरा खो गया है
कहां है दूसरा सिरा
इसी उलझन में ही उलझ गई है
ज़िन्दगी

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