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मेरे अल्फाज़

ज़िद पर अड़ा है

Neelam Kannojia

12 कविताएं

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हार नहीं मानता है ज़िद पर अड़ा है
छोटे शहर का है पर दिल का बड़ा है

टूट जाएगा पर झुकेगा कभी नहीं
स्वाभिमान उसका ज़रूरतों से बड़ा है

ख्वाब को बिछौना ,नींद को चादर कर
पथरीली ज़मीं पर बड़े मज़े से पड़ा है

ज़िंदा रहने के लिए, घूंट ज़हर के पिए
हरदम ना जाने किस - किस से लड़ा है

है अपनों से बहुत दूर फ़िर भी मन से
अब भी अपने गाँव की मिट्टी से जुड़ा है

हार नहीं मानता है ज़िद पर अड़ा है
छोटे शहर का है पर दिल का बड़ा है

- नीलम

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