आपका शहर Close
Kavya Kavya
Hindi News ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Nayan

मेरे अल्फाज़

नयन

यज्ञ दत्त

17 कविताएं

81 Views
मूक नयन भी क्या गाते
बिन अधरों के देखो कैसे
मधुर -मधुर स्वर टपकाते
हिये में छुपे हजारों अंकुर
पलकों पर पत्तें सुलगाते
ये तो है यक ऐसा सागर
जो बस मोती ही उपजाते
हिये में जब तूफान उठा हो
एक-एक करके बह जाते
यदि हो अधर नयन दो सम्मुख
तो अधरों को कुछ न बतलातें
मिलन नयन का हो नयनों से
बिन शब्दों के करते बातें
अट्ठहास करती हैं आंखें
अरु हर्षित हो के मुस्काते
मन है झूठा अधर है झूठा
नयन सत्यता ही दर्शातें
काला-काला नयन नगर है
पर कितने आलोक बिछाते
नयनों की तो बात न पूँछो
इसमे हैं लाखों दिन रातें
शांतिभाव नयनों से सीखों
जिसको ये चुपचाप सिखाते
सुन्दरता की खोज नयन से
निरखि-निरखि कर सुभग बनाते
यदि होता सारा जग अन्धा
तो कैसे सब सुन्दर हो जाते
सिसक-सिसक कर रो देतें हैं
हँस-हँस कर जब ये थक जाते

- यज्ञ दत्त शुक्ल"राजन"

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
Comments
सर्वाधिक पढ़े गए
Top

Other Properties:

Your Story has been saved!