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मेरे अल्फाज़

सपना ही रह गया

Nagendra Dutt

71 कविताएं

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एक ऐसा सपना 
जो था मेरा अपना 
मगर सपना ही था 
सपना ही रह गया 
एक ऐसा अरमान 
था जिसका कदरदान 
मगर अरमान ही था 
अरमान ही रह गया
कुछ न कर सका 
सिर्फ तड़फ़ ही सका  
था आसरा ख़ुदा का 
मगर कहाँ सिर्फ मै 
वह खुदा ही रह गया
था ख़याल दिल में  
दिल में ही रह गया 
जो भी था मेरा अपना 
वह भी दगा दे गया 
मगर सपना ही था 
सपना ही रह गया 
--नागेन्द्र दत्त शर्मा


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