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मेरे अल्फाज़

पलकें क्यों बोझिल थी उनकी...

Nagendra Dutt

71 कविताएं

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पलकें क्यों बोझिल थी उनकी, दिल न मेरा समझ सका
चाहत के अंधेरों में घिरकर, ना ही कुछ उनसे पूछ सका

जाने क्यों उनकी झील सी आंखों में, गहरायी उदासी थी
लगता था युगों से वो जैसे, किसी के दीदार की प्यासी थी

डूबे हुये थे शायद वो यादों में, अपने किसी फ़रिश्ते की
जाने सोच रहे थे क्या, तलाश थी उन्हें किस रिश्ते की

गहरायी उस ख़ामोशी में, उनका अंतर-भेद न पा सका
न उनके मन मंदिर में बसे, फ़रिश्ते को मै जान सका

अगर तन्हा कभी वे होते थे, मै पास उन्हीके रहता था
जाने वे किससे बातें करते थे, मै भी सुनता रहता था

एक दिन मुझसे रहा न गया, पास उन्ही के चला गया
सोचा था कुछ कहने को मगर, ऐसा कुछ कहा न गया

सामने उनके हुआ मुझे क्या ऐसा कुछ न समझ सका
दूरसे होती थी पहले बातें, पास से अब भी कर न सका

- नागेन्द्र दत्त शर्मा

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