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मेरे अल्फाज़

न्याय उल्लू का

Nagendra Dutt

71 कविताएं

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आओं दोस्तों तुम्हे सुनाऊँ शिक्षाप्रद

छोटी सी एक सुन्दर रोचक कहानी

ये है मोघिया मिथकथा,

पात्र हैं जिसके शेर, उल्लू, हंस
और उसकी हंसिनी रानी

एक दिन एक जंगल में, दूर कहीं से आया

उड़ते-उड़ते एक हंस-हंसिनी का जोड़ा

हंसिनी बोली- थक कर हो गयी हूँ चूर

करलो कहीं पर हे प्रिये! अब विश्राम थोड़ा

कई दिनों से उड़ते-उड़ते आ रहे थे

दूर कहीं से ये दोनों सुन्दर प्राणी

ढूँढ़ते हुए बैठने की जगह, बोला हंस-

सब्र करो जरा सा और मेरी प्रिये रानी

इधर-उधर नजर दौड़ायी हंस ने तो

मिल गया अति घना एक वृक्ष पुराना

जा बैठे दोनों थक कर तुरंत उसी पर

पर था उसपर किसी उल्लू का ठिकाना

देख के एक अजनबी जोड़े को, बोला उल्लू -

तुम आये किस देश से, कौन हो भाई ?

यह जगह तो है हमारी, चले जाओ यहां से

नहीं रह सकता यहाँ पर दूसरा और कोई

रात होगयी, मेरी हंसिनी थक गयी है भाई

आराम करके हम तुरंत सुबह चले जायेगें

मेहमान समझकर जरा सी जगह दे दो हमें

यंहा किसी तरह की हानि नहीं पहुंचायेंगे

सुनकर सारी बात और विनती हंस की

तरस खाकर, उल्लू भाई राजी होगया

देखकर आरामदायक एक मोटी सी डाल

हंसों का जोड़ा बेफिक्री से उसपे सो गया

बहुत दूरसे उड़कर आने से थक कर

हंसों का जोड़ा गहरी नींद में डूब गया

उल्लू को तो थी रात में जागने की आदत

कैसे आज रात बिताऊं सोचकर

हंसिनी के पास आ गया

रखा अपना एक पंजा हंसिनी पर, तब

हंसिनी ने आहिस्ता से उसे झटक दिया

उल्लू ने दोहरायी फिर से वही हरकत

हंसिनी ने गुस्से में उसे पटक दिया

होती रही रात भर ये कारिस्तानियां

न चली पेश तब उल्लू किनारे होगया

बीती पूरी रात ऐसे ही छेड़-छाड़ में

और फिर ऐसे ही सवेरा होगया

खुलते ही रात, जागकर हंस ने प्रातः

की भाई उल्लू से अपनी राम-राम

पंख फैलाये दोनों ने जाने को, बोले-

अब चलते हैं भाई उल्लू हम अपने धाम

तभी देख मौका झटपट उल्लू बोल-

तुम तो ख़ुशी से जा सकते हो हंस भाई

पर हंसिनी को तुम कैसे ले जा सकते हो

जो कि है अब मेरी अपनी लुगाई

ऐसे ही दोनों उलझ पड़े बहस में

तब बुलानी पड़ गयी पंचायत

हंस था अति अचंभित देख

वहां की अजीब गन्दी रिवायत

उल्लू के तो थे वहां सब परिचित

पर हंस के लिए सब अनजान

तब उल्लू गया राजा शेर के पास

जो था उस जंगल की शान

तुम हो राजा हमारे और पंच महान

सुनलो ! कल ये फैसला होना है

मैंने हंसिनी को बना लिया दुल्हन

तुम्हे इसी बात पर बल देना है

नाखुश होकर बोला शेर- उल्लू !

ऐसा अन्याय क्यों करता है

दुनिया को है सब पता कि

हंस- हंस होता है और उल्लू-उल्लू होता है

तब उल्लू ने उठाकर एक मिटटी का ढेला

धमकाया शेर को कुछ यूँ समझाकर

गुस्से में दूंगा फेंक इसे कुयें में

तेरे बेटे का नाम इसमें लेकर

घुलेगा ज्यूँ-ज्यूँ यह पानी से

घुलेगा त्यूं -त्यूं तेरा जवान बेटा भी

फिर कैसा लगेगा तुझे इस कुर्बानी से

कपटपूर्ण धमकी भरी बात सुनके

जंगल का राजा भी घबराया

औलाद का सुख है सबसे बढ़कर

क्या करूँ? सोच उसका सिर चकराया

हो गया राजी पक्ष में गवाही देने को

उसने पाखण्ड का झंडा फ़हराया

आकर उल्लू वहां से गया फिर

अन्य बड़े-बड़े पंचों के पास

पक्ष में कर, उसी तरह धमकाया सबको

किया न्याय और सत्यता को निराश

नियत समय पर जब बैठी पंचायत

किये पंचों ने फिर अनेक सवाल

क्यों बुलायी आज ये पंचायत?

किस बात पर हुआ बबाल?

पंचों ने जब पूछे कई प्रश्न तो-

बेचारे हंस ने बयां की पूरी सच्चाई

कहके अपनी दारुण व्यथा सुनाई

उल्लू का दावा है सरासर गलत

हंसिनी कैसे उसकी पत्नी हुई?

पंच महाराज करो सही फैसला

बस मेरी बात अब पूरी हुई!

पंच बोले- ठीक है भाई हंस

हमने सुनली तुम्हारी व्यथा

अब भाई उल्लू की बारी है

तुम भी सुनाओ अपनी कथा

उल्लू बोला- यह हंसिनी नहीं

भाई पंचों! मेरी ही घरवाली है

रचाया था ब्याह इससे मैंने

बिना इसके मेरा जीवन खाली है

पूछा गवाहों से पंचों ने तो पहले

जंगल के राजा शेर ने गवाही दी

हंसिनी को बता उल्लू की ब्याहता

उसने अपनी बात पूरी की

फिर अन्य गवाहों की बारी आयी

तो उन्होंने भी वैसे ही दोहराया

देख कर झूठ का कुनबा बड़ा

हंस का दुःख अत्यंत गहराया, बोला-

पंचों ! सत्य को तुमने झुठलाकर

बिलकुल भी ठीक नहीं किया है

पंच तो परमेश्वर होते हैं, तुमने

न्याय का साथ नहीं दिया है

अपना झूठा फैसला सुनाकर

पंच तो उठकर चले गए

हंसिनी हुई उल्लू की और

बेचारे हंस के आंसू बह गए

फिर ज्यों ही हंस हुआ तैयार

उड़ने को अपनी यात्रा पर

"देखी दुनिया आज की भाई हंस"

-बोला उल्लू रंग बदलकर

तुम तो हो मेहमान मेरे घर पे

हंसिनी जैसे मेरी बहना है

ये कलियुग है झूठा ऐसा ही

अन्याय-अनाचार यहाँ होना है

दिखाना चाहता था मै तुमको

कैसे चलती है सत्ता-सरकार

कैसे होता है षड्यंत्र और

कैसे बढ़ता है अत्याचार

चाहे कोई हो शासन में

चाहे हो कोई प्रशासन में

एक से बढ़कर एक मिलेंगे

भ्रष्टाचारी राजनीती के आँगन में

कोई है बिकता धमकी से

कोई बिकता आसन से

कोई बिकता भाषण से

तो कोई बिकता राशन से

जंगल के राजा से लेकर

छोटे-बड़े सभी पंच

किस प्रकार का करते हैं न्याय

एक-दूसरे के स्वार्थ की खातिर

किस प्रकार रचे जाते प्रपंच

तू है हंस तो ये है तेरी हंसिनी

ना हो दोस्त तू बिलकुल मायूस

ख़ुशी-ख़ुशी जाओ दोनों यहाँ से

ना खोओ तुम अपने होश

देखके न्याय बुद्धिमान उल्लू का

हंस-हंसिनी दोनों खुश हो गए

राम-राम कर उल्लू से, ले विदा

अपने देश को 'नागेन्द्र' उड़ चले गए

-नागेन्द्र दत्त शर्मा


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