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मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल - मैंने देखे कई सारे ऐसे-२ लोग...

Nagendra Dutt

71 कविताएं

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मैंने देखे कई सारे ऐसे-२ लोग
नित करते गलत धन का भोग

बाहर से दिखती मौज ही मौज
पर भीतर से खाते रोग ही रोग

कभी नहीं की मदद किसी की
पर धन का तो करते रहते योग

न्याय किसी से भी किया नहीं
अपनी बारी में अब कैसा ढोंग

नहीं झांकते गिरेबां में अपने
क्यों जलते देख औरों का जोग

चंद दिनों की ही तो जिंदगी है
कर लो थोड़ा इसका सदुपयोग

धर्म-कर्म तो भुला ही दिया है
जाने क्यों बिक जाते हैं लोग

तुमने क्या सोचा है 'नागेन्द्र'
किस इलाज़ से भागेगा रोग
-नागेन्द्र दत्त शर्मा



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