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मेरे अल्फाज़

दुनिया के खेल निराला बा।

Munna Kumar

196 कविताएं

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दुनिया के खेल निराला बा
कहीं उच कहीं खाला बा
जीयत मनई मुवावल बा
गारल मुर्दा उखारल बा।

जातिवाद के पठन-पाठन कर
झगड़ा लगावल बा
दुनु पगहा हाथे धके
बैलन के भरमावल बा।

घरवा तोहार फोड़ गइल
बोला-भाखा खानदानी बा
सच छुपल चूहानी बा
"मुन्ना"झूठ के चढल जवानी बा।।

अनमोल"मुन्ना"एकलव्य
ग्राम:कटेया छपरा सारण बिहार



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