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मेरे अल्फाज़

बहुत मासूम हो तुम

Muhammad Yaseen

2 कविताएं

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बहुत मासूम हो तुम और ज़माना ज़ालिम
यूँ हर किसी ऐतबार किया न कीजिए
बहारें रूठ जाती हैं गुलशन से
यूँ जुल्फों को अपने चहरे पर बिखेरा मत कीजिए
धड़क उठता है मेरा तेरी एक आवाज़ से
यूँ अपने लबों से हमारा नाम पुकारा न कीजिए
खुद ज़फा ढा कर हम पे सितम कर के
यूँ हमको बेवफा कहा न कीजिए
बढ़ जाता है बज्म में आपके आने से
यूँ आँखों मे काजल लगाया न कीजिए

- मुहम्मद यासीन

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