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पतझड़ की उदासी

                
                                                                                 
                            पतझड़ आने को है
                                                                                                

तुमसे बिछुड़ने का ग़म है।
सावन आया! साथ में संग बहार लाया!
बहारों का संग रंगीन दिवस।
तपती गर्मी बीत गयी
हम फिर भी सग संग टहनी के साथ रहे
जब भी हवा चली,फूलों के संग झूम उठी।
हवाओं ने चूमा,
कलियों को भंवरे ने, और कुछ फूलों को लोगों ने तोड़ा
चूमा मसला, और फिर किसी मंदिर के चौखट
पर गिराया।
,गम नहीं था फिर भी अपनों से छूटने का
ये जिंदा थी कि बहारें बाकी है
कलियां मुसकाई है ,
कल का सूरज किरणों के संग आएगा
फिर से कली फूल बनेगी
और ये हसीन वादियों में फिर से महक उठेगा।
अपनी खुशबू हवा में बिखेरेगा।
कैसा मौसम आया है
पतझड़ को संग लाया है
कल जो अपने थे साथ मेरे
वो छूट जाएंगें होकर,
पराये मिट्टी में मिल जायेंगें।
यादें संग होगीं पर टहनी भी जुदा होगी
ठूठा पेड़, सूखी टहनी, किस काम की
लोग जलाएंगें
अर्थी में भूल जाएंगे,
कभी इसी से हवा में खुशबू बिखरी बिखरी थीं।
जीवन साथी, दिया और बाती बन न सके हम
पतझड़ में साथी होकर
जुदा हम प्यासे रह गये
अर्थी में जलकर भी जल न सके
सावन की आस लगाए
बंजर भूमि में भी खड़े ही रहे
फिर से कोंपल आएगा,
कली, फूल बनेगी ,
हरीयाली चहुंओर होगी।
हवा के संग हिलोरें होगी
अलमस्त अमलतास होगी।
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2 months ago

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