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मेरे अल्फाज़

"अब वर्तमान हुए जाते हो"

Mon Bhattacharya

185 कविताएं

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उठो पुत्र खोलो आँखें देखो मैं आयी
संग अपने आशीष की पोटली लायी
देखो समय चहूँ ओर घनायी
माँ भारती हैं तुम्हें बुलाई
तुम भविष्य थे अब तक
अब वर्तमान हुए जाते हो
भले हो यह कलियुग
कभी न हो तुम बेसुध
निष्ठां-कर्मठ-न्याय-सतता
देशप्रेम व सदाचार
सहज सब कुछ निभाओ खुद
माँ का आशीष कहे सुनो वत्स !
सुख-शांति-वैभव का मूल यही सर्वस्व |
"मन".बावरी



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