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मेरे अल्फाज़

गांव-शहर-घर, भटका मन दर-दर

Mon Bhattacharya

63 कविताएं

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गांव की अब क्या सुनाये
गांव शहर की ओर भागा हैं|
हर युवा चाहे ,करे न खेती
उनको जींस-पैंट अब भाया हैं|
शहर की चका-चौंध व फ़िल्मी दुनिया के मारे,
भविष्य गांव की,पुश्तैनी-खेती को दुत्कारा हैं |
कुछ तो लोग गांव छोड़ दिए ,
कुछ का अधिया में गुज़रा हैं|
बच्चों के बिन जो बुजुर्ग, सब दिन गिन रहे,
जिंदगी हैं कब तक,इसका कौन ठिकाना हैं |
गांव की अब क्या सुनाये
गांव शहर की ओर भागा हैं|
कुछ लोगों ने नई-नई तकनीकी अपना कर,
अपने खेतों में हरियाली लायी हैं |
जिधर देखो ,उधर रसायन
भविष्य का तो पता नहीं,जीत अभी की आयी हैं |
सरकार की देन, माँ-बहनों को
लगभग वहीं घरों को चलाती हैं|
पापड़-अचार-नमकीन-खिलौना
आज कुटीर उद्दोग यूँ गांव-गांव फैला हैं |
गांव की अब क्या सुनाये
गांव शहर की ओर भागा हैं|
शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ
फिर भी,शिक्षकों का हाल बुरा हैं |
कहीं शिक्षक हैं नदारत
कहीं उल्टा-पाठ पढातें हैं |
कहीं बच्चें जाएँ न स्कूल
भूख के मारे ,वे काम पे जाते हैं |
कहीं-हँसता,कहीं-रोता गांव यूँ ही
कितने ही हाल में ,स्वाभिमान पिरोता हैं |
गांव की अब क्या सुनाये
गांव शहर की ओर भागा हैं|
***
शहर का अब हाल क्या सुनाऊँ
बड़े शहरों को देख आँखें चौंधियाँ जाते हैं|
बड़े-बड़े ,बीस-तीस मंजिला,पत्थर-काँच का
फ्लैट खड़े हुए,ज्यूँ अट्टहाँस करते हैं |
कब सूरज और कब चाँद निकलता,पता नहीं
पत्थर की दीवारें,मुँह-फाड़े आकाश को निगलते हैं |
मेट्रो- हवाई-अड्डा - बस-अड्डा ,चारों ओर
मॉल -शोरूम -पार्क-स्टेडियम-कचहरी दीखते हैं |
शहरों की हर दिन व्यस्त और शाम निराली
रात के अंधेरें-जगत में कितने युवा भटकते हैं |
शहर का अब हाल क्या सुनाऊँ
बड़े शहरों को देख आँखें चौंधियाँ जाते हैं|
गली-गली शुद्ध हवा नहीं,कभी-कभी
पानी को भी लड़ते-झगड़ते-तरसते हैं |
स्कूल-कालेजों से भरे पड़े हैं सारे
प्राइभेट-स्कूल मनमानी रकम ऐठतें हैं |
कालेजों का हाल बुरा यूँ ,पढ़ाने-वाले कम
और पढ़ने-वाले अक्सर बायकॉट करते हैं |
राह पर चलते लाखों यानें
प्रदूषण ही प्रदूषण फैलाते हैं|
धुंए से बुरा हाल हैं अब तो
आधी आबादी रोग-ग्रस्त रहते हैं |
शहर का अब हाल क्या सुनाऊँ
बड़े शहरों को देख आँखें चौंधियाँ जाते हैं|
खान-पान का हाल बुरा हैं
हर तीसरेघर,कैंसर के रोगी मिलते हैं|
चिकित्सालय की कमी नहीं शहर में
फिर भी बिन इलाज कई रोज मर जाते हैं |
जैसे नाना विध रोग,अधिक भुगतान रकम का
पार्थिव शरीर संग बाध्य, पहले रकम चुकाते हैं|
इतने चिकित्सालयों के रहते,वक्त बे वक्त
मरीजों की लाइन लगे,बेड कम पड़ जाते हैं |
शहर का अब हाल क्या सुनाऊँ
बड़े शहरों को देख आँखें चौंधियाँ जाते हैं|
युनिभर्सिटी की बात निराली,यहाँ अक्सर
पढ़ाई से हट कर ,इनपर राजनीति छायी रहती हैं|
हड़ताल-बंद,नफा-नुकसान,कटौती-बढ़ोतरी यहाँ
नशा-दुरपयोग,हानि-कुकृत्य सभी आम बात हैं |
कोई घुटकर जीता,कोई खुल कर जीता
नए-नए सपनें यहाँ किसी न किसी को दिख जाते हैं|
हँसता-गाता,रोता-मुस्कुराता और मदमत्त
शहर हर-रोज अपना नुमाईश करता हैं |
शहर का अब हाल क्या सुनाऊँ
बड़े शहरों को देख आँखें चौंधियाँ जाते हैं|
***
घर-घर का हाल क्या सुनाए यहाँ
रोज पुरातन से नवीनता का बहस दीखता हैं |
युवा-वर्ग का ज्ञान प्रकाशित
फिर भी बुजुर्गो को मूर्ख ये कहते हैं |
हर टेक्नॉलजी से हैं ये अवगत
और घर के नियमों को नकारते हैं |
सारा बचपन पढ़ाते जी-जान से जो,बड़े बने
उनकी नजरों में माँ-पिता व्यर्थ बनजाते हैं |
शहर का अब हाल क्या सुनाऊँ
बड़े शहरों को देख आँखें चौंधियाँ जाते हैं|
कहीं हैं लड़ना,कहीं झगड़ना
कहीं नारी का अपमानित होती हैं |
कहीं रंग-भंग,कहीं स्वप्न-भंग
कहीं घर-घर प्रतीक्षाएँ रोती हैं |
इतने ऊंच-नीच के वावजूद
घर-घर नई आशाएं दिखती हैं |
टूटे घर फिर से जुड़ने को लालायित
बच्चों की बदली भावनाएं बतलाती हैं |
घर-घर का क्या हाल सुनाऊँ
कभी शर्म से,कभी गर्व से आँखें नम हो जाते हैं |

नई दिशा के नई आशा की किरणें,उड़ने को
'मन' को दीखता,नए पंख फैलाते हैं |

- मन 'बावरी'

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