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मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल

Mohan Begowal

5 कविताएं

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कलम चला रहा कैसे वो झाँकता कम है।
है सोच और ये लिखत का फ़ासला कम है।

वो हम सफ़र मेरा ये बात मानता कम है।
मिले तो रोज़ मगर साथ राब्ता कम है।

ये आदमी कैसी दिल की निभा रहा देखो,
बहुत कहे ये मगर खुद को बदलता कम है।

नगर नगर मैं भी घूमा हूँ रात भर ऐसे,
मगर कहूँ कैसे आवारगी सदा कम है।

सवाल साथ हमेशा नहीं रहा उसका,
जवाब पास हो भी तो ये बोलता कम है।

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