एक दिन मैं चला जाऊंगा यक़ीनन मर जाऊंगा

                                एक दिन मैं चला जाऊंगा यक़ीनन मर जाऊंगा
तुम ढूँढोगे मुझको और मैं कहीं खो जाऊंगा

हमेशा फिर मेरी यादें तुम को सताएंगी
जीते जी मैं याद न आया मर कर पर आऊँगा

तुम मुझको सोचोगे और सोचे जाओगे
मै ये सब कहीं दूर से महसूस कर पाउँगा

जब जब तुम आईने मैं खुद को देखोगे
क़तरा क़तरा आंसू बन कर चेहरे पर छा जाऊँगा

जब रातों को सोये होगे खवाबों मैं आऊँगा
अचानक उठकर रोओगे मैं आँखों से ओझल हो जाऊंगा

फिर तुमको अंदाज़ा होगा सारिम के न होने का
जैसे ही सो जाऊंगा फिर मैं उसका हो जाऊंगा

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
5 days ago
Comments
X