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मेरे अल्फाज़

रे विचलित मन

अजय पांडेय

5 कविताएं

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रे विचलित मन, विचरण मत कर
कर विवेक और शांत बैठ
धैर्य सहजता निर्मल हिय प्रिय
रख सहेज बन दृढ़ कर पैठ।

जग प्रपंच माया विस्तार
जगदीश्वर सबके आधार
कर विचार कर हृदय उदार
उद्घाटित हों सत्य विचार।

मन में ठान कर दृढ़ विचार
कर उत्पन्न, सहज वैराग्य
विष ही तो है समाज प्रसाद
कर नित जगहित यह आहार।

तीर व्यंग के सहता जा तू
जीवन के हित बहता जा तू
नये खोज नित करता जा तू
निज विस्तार में बढ़ता जा तू।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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