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मेरे अल्फाज़

एक कांच की कहानी

Mihir Ranjan

22 कविताएं

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एक कांच की कहानी सुनो
एक पत्थर की ज़ुबानी सुनो-
क्या नूर था उस कांच में
चमक रहा था उजालों में
रेत की पनाह में, अंधेरी रात में
जगमगा रहा था अंधेरी राहों में
पर टूट गया वो इस कदर
बिखर गया उस रंगहीन रेत पर
कि गुज़र गया एक मुसाफ़िर ऊपर से उसके-
बिल्कुल बेखबर


वो था मेरा दुश्मन
पर रहा सदा ही दोस्त बनकर
ना मुझसे लड़ा वो कभी, ना मुझसे कभी टकराया
टूटा तो वो खुद से भिड़कर
उसकी चमक से चमक रहा था
मरा पड़ा यह रेगिस्तान
पर आखिर वो भी शामिल हो गया
इस ज़मीं से, रेत में मिलकर

खुद की चमक उसने फैलाई
पर खुद रंगहीन रह गया
कितनी राहें मुसाफ़िरों को उसने दिखाई
पर खुद कहीं विलिन रह गया
बड़ा नाज़ुक था वो अभागा
और यह रेत कितना कठोर
देखो जीत गया रेत और वो कांच
पल में ज़मीन हो गया


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