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मेरे अल्फाज़

ये कांटे मुझको चुभते हैं...

michal dogulus

22 कविताएं

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ये कांटे मुझको चुभते हैं
इन काँटों को सहलाऊँ क्यों?
जब दर्द नहीं भाता मुझको
तो उससे गीत बनाऊं क्यों?
माना की पतझड़ अच्छा है
पर मैं बसंत को भूलों क्यों?
कजरारे नैना भाते हैं
पर रक्तिम अधरों को न पीयूं क्यों?
है सुंदरता प्यारी मुझको
इसके ही गीत सुनाऊंगा
जिसका तन मन दोनों सुन्दर है
ऐसे शिव को ना पूजूँ क्यों ?
जैसे अतीत को भूल प्रकृति
नित नवल धवल श्रृंगार करे
जैसे हिमगिरि को छोड़ नदी
अपने सागर की ओर चले
हे प्रभु मैं तेरा अंश सही
तुझसे पहले रुक जाऊं क्यों ?

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